वास्तु शास्त्र का महत्व

वास्तु शास्त्र का महत्व

आज की भागभाग भरी जिंदगी और कठिनाईयों ने लोगों को इस कद्र हताश कर दिया है कि जीवन में संतुलन बनाना बहुत जरूरी है। इस लिए वास्तु शास्त्र का महत्व बहुत बढ़ गया है। आईए मैं वैदिक ज्योतिष आचार्य विनय बजरंगी आपको बताता हूं वास्तु शास्त्र के महत्व के बारे में।

पृथ्वी लगभग चौबीस घंटे में अपनी धुरी के इर्द-गिर्द एक चक्कर पूरा करता है। जो अपनी धुरी पर लगभग साढे तेईस डिग्री झुकी हुई है।पृथ्वी के एक चक्कर को ही दैनिक गति कहते हैं। ये सूर्य के चारों ओर परिक्रमा पूरी करती है जिसे वार्षिक गति कहते हैं। पृथ्वी की दैनिक गति के कारण ही रात और दिन बनते हैं। वार्षिक गति के कारण ही ऋतुएं बनती हैं। इक्कीस मार्च से तेईस सितंबर को पृथ्वी अपनी परिक्रमा पथ पर ऐसी अवस्था में होती है कि सूर्य की किरणें भूमध्य रेखा पर सीधी पड़ती हैं। इन उत्तरी गोलार्द्ध और दक्षिणी गोलार्द्ध दोनों में सूर्य का प्रकाश समान रूप में पड़ता है। इसलिए इन दोनों में दिन रात बराबर होते हैं। इक्कीस मार्च के बाद पृथ्वी आगे बढ़ते हुए ऐसी स्थिति में आ जाती है कि उत्तरी गोलार्द्ध में दिन की अवधि रात रात्रि की अपेक्षा अधिक होती है और गर्मी की ऋतु आ जाती है। इक्कीस जून को सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर सीधी पड़ती हैं। यह दिन सबसे लंबी अवधि का होता है और रात सबसे छोटी। इसके बाद 14 जुलाई से दिन की अवधि घटने लगती है और रातें लंबी होने लगती हैं। 23 सितंबर को दिन रात समान अवधि के होते हैं।

जब सूर्य की किरणें दक्षिण गोलार्द्ध में सीधी पड़ती हैं। 21 दिसंबर को सूर्य की किरणें मकर रेखा पर सीधी पड़ती हैं। यह दिन दक्षिणी गोलार्द्ध में सबसे लंबी अवधि का होता है और रात सबसे छोटी। वहां गर्मी की ऋतु रहती है। इसके उलट उत्तरी गोलार्द्ध में अधिक शीत ऋतु होती है। रात सबसे लंबी और दिन सबसे छोटा होता है। 14 जनवरी से 14 जुलाई तक इसका विपरीत क्रम शुरू होता है। सूर्य उत्तर से दक्षिण की ओर चलता है। इसे उत्तरायण कहा जाता है। 14 जुलाई से 14 जनवरी इसके विपरीत स्थिति होती है। जिसे दक्षिणायन कहते हैं। ज्योतिष शास्त्र में उत्तरायण अवधि को सभी कार्यों के लिए शुभ माना जाता है।

आधुनिक विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया है जैसे विभिन्न प्रकार के सामान टीवी, टैलीफोन और रेडियों के लिए किसी विशेष कार्य प्रणाली में रखने से लाभ मिलता है। वैसे ही घर खरीदते समय या बनाते समय ग्रह दशा, योग पर विचार अवश्य कर लेना चाहिए।

 

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