TULSI VIVAH

TULSI VIVAH

कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी को तुलसी माता का विवाह सालिग्राम से किया जाता है | सालिग्राम भगवान विष्णु जी का ही अंश हैं | तुलसी जी का सालिग्राम से विधि पूर्वक विवाह करने से सभी मनोकामनाओं की पूर्ती होती है | ये विवाह  संपन्न कराने से जातक के समस्त पाप नष्ट होते हैं तथा घर में सुख समृद्धि का वास होता है | यदि जातक के पास कन्या नहीं हैं तब वो यदि  विधि -विधान  पूर्वक ये विवाह संपन्न कराता है तब वह कन्यादान जैसे महादान  के पुण्य का भागी बनता हैं  | आइये मैं डा . विनय बजरंगी आपको बताता हूँ कि आखिर क्यों करते हैं सालिग्राम का विवाह तुलसी माता से , और कौन हैं सालिग्राम |

कथा –

प्राचीन काल में  शंखचूड़ नाम का असुर था | जो कि बहुत पराक्रमी और बलशाली था | उसकी पत्नी का नाम तुलसी था जो की पतिव्रता स्त्री थी | उसके सतीत्व के कारण शंखचूड़ अजय था | उसका सती तेज शंखचूड़ की कवच की तरह रक्षा करता था | शंखचूड़ ने अपने बल और पराक्रम से स्वर्ग पर अपना अधिकार बना लिया था |

 उसके अत्याचार से समस्त देवगण परेशान थे | सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए और सहायता मांगी तब भगवान विष्णु ने शंकचूड़ से युद्ध का फैसला किया | भगवान शिव के नेतृत्व में युद्ध प्रांरभ किया गया परन्तु शंखचूड़ पराक्रमी था उसे मायावी शक्तियों  का ज्ञान था | और उसकी पत्नी का सतीत्व कवच के समान उसकी रक्षा कर रहा था जिससे उस पर विजय प्राप्त करना मुश्किल हो रहा था | क्योंकि उसकी पत्नी ने उसकी विजय के लिए एकादशी का उपवास रखा था और निरंतर भगवान की पूजा कर  रहीं थी तब भगवान शिव ने कहा की जब तक उसका अनुष्ठान नहीं टूटेगा तब तक शंखचूड़ को नहीं मारा जा सकता तभी इस पर विजय प्राप्त की जा सकती है |

 ऐसा सुनकर भगवान विष्णु शंखचूड़ का रूप धारण कर तुलसी माता के समक्ष गए और वहां जाकर युद्ध में विजय प्राप्त करने कि सूचना दी |  शुभ समाचार सुनते ही तुलसी जी ने उठकर अपने पति के चरण स्पर्श किये | इस प्रकार बीच में उठने से उसका अनुष्ठान टूट गया | ऐसा करते ही तुलसी माँ के समक्ष उसके पति शंखचूड़ का सिर आ गिरा और भगवान विष्णु अपने रूप में आ गये | इस प्रकार छल होने पर तुलसी माँ ने भगवान विष्णु को ह्रदयविहीन होकर पत्थर बनने का श्राप दे दिया |

भगवान विष्णु जी  ने तुलसी माता के श्राप को शिरोधार्य कर वचन  दिया कि हे ! देवी मैंने आपके सतीत्व को भंग किया है इसलिए अगले जन्म में तुम तुलसी के पौधे के रूप में जन्म लोगी और मैं सालिग्राम पत्थर बनूँगा और तब मेरा विवाह तुम्हारे साथ होगा | मेरी पूजा हमेशा तुलसी दल से होगी एवं तुम्हारे पति कि हड्डियों का शंख बनेगा और उस शंख कि ध्वनि से सभी देवी देवताओं कि आराधना होगी |

जो मनुष्य कार्तिक एकादशी के दिन तुम्हारे साथ मेरा विवाह करेगा उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी | और तब तुलसी जी अपने पति के साथ सती हो गयीं और उसी स्थान पर एक पौधा उगा | उस पौधे को तुलसी पौधा नाम से जाना गया |  इस प्रकार सालिग्राम जो कि भगवान  विष्णु का प्रतिरूप हैं और तुलसी का विवाह संपन्न हुआ | ये विवाह भगवान विष्णु और महा लक्ष्मी जी का ही प्रतीकात्मक विवाह माना जाता है |  देवउठनी एकादशी  के दिन तुलसी विवाह से या तुलसी पूजा से कोई भो जातक वियोग नहीं होता है |

तुलसी विवाह विधि :

 सर्वप्रथम तुलसी के पौधे को गंगा  जल  से  स्नान  कराएं उसके बाद लाल रंग की चुनरी तुलसी माँ  को उड़ा दें | और तुलसी माँ को सोलह शृंगार की वस्तुएं चढ़ा दें और सालिग्राम के ऊपर  तुलसी दल  रख  उन्हें  तुलसी माँ के पास रख दें | उसके बाद रोली और अक्षत से तुलसी माँ और सालिग्राम  का तिलक करें | उनके समक्ष धुप दीप जलाएं  और फिर गणेश वंदना कर पूजा प्रारम्भ करें उसके बाद तुलस्यै नमः  एवं  ॐ नमो भगवते वासुदेवाये मंत्र जाप करते हुए तुलसी पूजा करें | उसके बाद एक नारियल तुलसी माँ के समक्ष चढ़ा दें | और फिर पुष्प अर्पित करने  के बाद भगवान सालिग्राम जी  की मूर्ति अपने हाथों में  में लेने के बाद तुलसी माँ की सात बार परिक्रमा करें | परिक्रमा के समय मंत्रो का जाप करते रहे | और कन्या दान के समय संकल्प करते समय विष्णु भगवान की आराधना करे | और तुलसी विवाह में कन्यादान अवश्य ही करना चाहिए |तुलसी विवाह पर ब्राह्मण को फल, अन्न, वस्त्र, बर्तन, दक्षिणा आदि अवश्य ही दान करनी चाहिए | उसके बाद आरती  करने बाद विवाह संपन्न हो जाता है |

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