KATYAYANI DESTROYS ENEMIES

katyayani VINAY BAJRANGI

कात्यायनी 
षष्ठ नवरात्रि को कात्यायनी माता की पूजा की जाती है | 
वंदना मन्त्र 
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहन । 
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ।।
नव दुर्गा पूजन के छठे दिन दुर्गा के  छठे  स्वरूप कात्यायनी माता की उपासना की जाती हैं | इस  दिन साधक का मन 'आज्ञा' चक्र में स्थित होता है | कात्यायनी माता के द्वारा बड़ी सरलता से  अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष, चारों फलों की प्राप्ति हो जाती हैं | 
उपयुक्त मन्त्र  का जाप शुद्ध उच्चारण क्रिस्टल की एक  माला से 108  बार करे |  फिर दुर्गा जी की आरती कर के, कात्यायनी माता का ताम्बे का  चित्रयुक्त  बीसा यंत्रयुक्त, देवी भक्तों में वितरण करें, तो अधिक लाभ प्राप्त होता हैं |


छठीं नवदुर्गा कात्यायनी होती हैं ,और ये पार्वती का दूसरा नाम हैं | स्कंद पुराण में ऐसा बताया गया हैं, कि वो भगवानो के क्रोध से जनित हुई हैं और उन्होंने महिषासुर नाम के राक्षस का वध किया हैं | 
योग और तंत्र में उनका स्थान अंजना चक्र बताया गया हैं या फिर तीसरा नेत्र जो चक्र हैं वो उनके आशीर्वाद से ही खुलता हैं | 
पुराण ऐसा बतलाते हैं, कि कात्यायना ऋषि की वो पुत्री हैं | इसलिए उनका नाम कात्यायनी पड़ा | कलिका पुराण में ऐसा बताया गया हैं कि ऋषि कात्यायना ने उनकी सबसे पहले बार आराधना की | किसी भी तरीके से वो दुर्गा का एक रूप होती हैं | उनको नवरात्री के छठें  दिन पूजा जाता हैं | शत्रुओं का हनन  करने में वो सर्वपरि होती हैं | 

माँ कात्यायनी का ज्योतिष सम्बन्ध 
आपकी कुंडली के वो छठें भाव के अंदर विराजित होती हैं | साथ - साथ वह लग्न को प्रबल करने की अदम्य क्षमता रखती हैं | यदि आप  उनकी विधि - विधान के साथ पूजा अर्चना करते हैं, तो आपकी कुंडली का छठां  भाव और लग्न ये दोनों के दोनों  बलिष्ठ होते हैं | इनका  उत्तर का  मुख भगवान शिव का हैं , जिनका रंग नीला और त्रिनेत्रधारी हैं | और यही छठां मुख जब जागृत  होता हैं, तो यह सारे के सारे राक्षसों का पतन करने की क्षमता रखती हैं |