KAALRATRI SHANI FORM OF MATA

kaalratriVINAYBAJRANGI

माँ कालरात्रि :
 नवरात्री के सातवें दिन हम माँ कालरात्रि की पूजा करते है | घने अंधकार के समान काला रंग होने के कारण इन्हे कालरात्रि कहा गया |  आज के दिन साधक का मन ' सहस्नार ' चक्र में स्थित होता है | इस दिन से ब्रह्माण्ड की समस्त शक्तियों सिद्धियों का द्वार खुला होता है | जो साधक विधिपूर्वक  माता की उपासना करता है उसे यह सिद्धियां प्राप्त होती है | माँ कालरात्रि के तीन नेत्र है और तीनों ही गोल है | इनका रूप अत्यंत भयानक है एवं बाल बिखरे हुए है |
माँ कालरात्रि की कथा :
 प्राचीन काल में शुम्भ -निशुम्भ और रक्तबीज नाम के शक्तिशाली दानव थे | उन्होंने समस्त ब्रह्माण्ड में अपना आतंक मचा रखा था | सभी देवगणों में इनके आतंक से हाहाकार मच गया | और तब वे सहायता के लिए कैलाश स्वामी महादेव के पास गए | शिवजी ने माँ पार्वती से अपने भक्तों की रक्षा करने को कहा |
माँ पार्वती अपने भक्तों की रक्षा हेतु माता दुर्गा का रूप धारण किया और दुष्टों के संहार करने पृथ्वी पर आयीं | माँ दुर्गा ने दैत्य शुम्भ और निशुम्भ का वध कर दिया | परन्तु जब माता ने असुरो के राजा रक्तबीज का वध किया तो उसके रक्त से अनेकों रक्तबीज उत्पन्न हो गए और वो पूरे ब्रह्माण्ड में आतंक  मचाने लगे | भूलोक पर चारों और हाहाकार देख माँ दुर्गा अत्यधिक क्रोधित हो गयीं तब उनके क्रोध से एक तेज उत्पन्न हुआ और उस तेज से महा काली की रचना हुई | महा काली ने  क्रोधित होकर सभी असुरों का विनाश कर दिया फिर भी उनका क्रोध शांत नहीं हो रहा था | माता कालरात्रि के वेग को शांत करने के लिए स्वयं महादेव उनके मार्ग में आकर लेट गए  और तब माता काली का पैर शिव जी के ऊपर रखा गया | और जब माँ को एहसास हुआ की उन्होंने अपने स्वामी के ऊपर पैर रख दिया है तो उनकीदुख से उनकी  जिब्हा बाहर निकल गयी | कहा जाता है बस तभी से माता काली की जिब्हा बाहर रहती है |


पूजा विधि : 
नवरात्रि के सप्तम दिन माँ कालरात्रि की पूजा करने से साधक के समस्त शत्रुओं का नाश होता है | हमे माता की पूजा पूर्णतया: नियमानुसार शुद्ध होकर एकाग्र मन से की जानी चाहिए | माता काली को गुड़हल का पुष्प अर्पित करना चाहिए | कलश पूजन करने के उपरांत माता के समक्ष  दीपक जला  रोली , अक्षत ,से तिलक कर पूजन करना 
चाहिए | और माँ काली का ध्यान करना चाहिए |


ध्यान मंत्र
करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥
दिव्यं लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।
अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम॥
महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।
घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥
सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।
एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥


 ध्यान के बाद सात वर्ष की कन्या का पूजन करना चाहिए | और माता को गुड़ का प्रसाद अर्पण कर किसी यथायोग्य ब्राह्मण को गुड़ दान करना चाहिए | ऐसा करने से समस्त शोक का नाश होता है | पूजन के उपरांत साधक को 108  बार नीचे दिए मंत्र का जाप कर प्रत्येक मंत्र पर एक लौंग चढ़ानी चाहिए | मंत्र पूर्ण होने के बाद सभी लौंगों  को अग्नि में दाल देना चाहिए इससे समस्त क्षेत्रों का नाश होता है |
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता, लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।
वामपादोल्ल सल्लोहलता कण्टक भूषणा, वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

आज के दिन साधक अगर सम्पूर्ण विधि -विधान के अनुसार माता की उपासना करता है तो उसे माता की सिद्धि प्राप्त होती है | उसके समस्त भय , रोग और शत्रुओं  का नाश होता है |


माता कालरात्रि का ज्योतिष सम्बन्ध :
साधक को अपनी कुंडली का ज्योतिष विश्लेषण कराकर अपने ग्रहो की दृष्टि जानकार माता काली की पूजा उपासना विधि - अनुसार करनी चाहिए | यदि किसी साधक की कुंडली में शनि ग्रह की दृष्टि अशुभ है | और शनि बलवान है तो साधक को शनि ग्रह को शांत करने हेतु माता काली की विशेष पूजा करनी चाहिए | बजरंगी धाम में भी विभिन्न साधक  अपनी कुंडली का ज्योतिष विश्लेषण कराकर अपने ग्रह नक्षत्रों की दशा जानकर ये विशेष पूजा संपन्न कराते है |