Gayatri Jayanti

Gayatri Jayanti

गायत्री जयंती ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है | माँ गायत्री समस्त देवी देवताओं की माता कही जाती हैं , इनके पांच सिर और दस हाथ हैं , जिनमे चार सिर चारों वेदों के  प्रतीक है और पाँचवां सिर स्वयं सृष्टि है और उनके दस हाथ भगवान विष्णु के प्रतीक हैं | यह कमल के पुष्प पर विराजमान हैं एवं इनकी सवारी हंस है | यह ब्रह्म्मा जी की दूसरी पत्नी हैं

क्या है गायत्री जयंती -

महान गुरु महर्षि विश्वामित्र ने चारों वेदों से मिलाकर एक मंत्र बनाया | जो कि उन्होंने ज्येष्ठ माह में शुक्लपक्ष की  एकादशी को सुनाया | इसलिए इस दिन को गायत्री जयंती कहा गया  | यह सभी मंत्रों में सबसे महत्वपूर्ण है | इस मंत्र के तीन चरण है और चौबीस अक्षर है -

१- ॐ  

२- भूर्भुवः स्वः

३- तत्स्वितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात |

जिसमे ॐ अग्नि ,वायु और आदित्य का प्रतीक है | ॐ शब्द में सारे ब्रह्माण्ड का स्वरूप है ,और भू शब्द पृथ्वीलोक , ऋगवेद ,अग्नि पार्थिव जगत और जाग्रत अवस्था का सूचक है | भुवः शब्द अंतरिक्ष लोक यजुर्वेद , वायु देवता ,प्राणात्मक जगत का सूचक है | स्वः शब्द दुयलोक ,सामवेद .आदित्य देवता सुषुप्ति अवस्था का सूचक है | " त " परमात्मा एवं ब्रह्म , " सवितु "  ईश्वर एवं सर्ष्टिकर्ता का सूचक है | " वरेण्यम " का अर्थ पूजनीय है |  " भर्गः " अज्ञानता तथा पाप निवारक है |  " देवस्य " भगवन का ज्ञान स्वरुप है |  "धीमहि " का अर्थ ध्यान करना है  | " धियो: " बुद्धि एवं प्रज्ञा का सूचक है | " यो " का अर्थ है जो | " नः " का अर्थ है हमारा और  प्रचोदयात का अर्थ  है  प्रकाशित   करें |

गायत्री  मंत्र का सम्पूर्ण अर्थ -

हम ईश्वर की महिमा का ध्यान  करते हैं जिसने इस संसार को उत्पन्न किया है जो  पूजनीय है जो कि  ज्ञान का भण्डार है , जो पापों तथा अज्ञान को दूर करने वाला है , वह हमें प्रकाश दिखाए और सत्य के पथ पर ले जाये | गायत्री मंत्र में पाँच विश्राम होते हैं हमे पाँचो विश्राम पर  थोड़ा  रुकना चाहिए |

क्यों हैं देवी गायत्री ब्रह्म्मा जी की दूसरी पत्नी -

शाष्त्रो के अनुसार एक बार ब्रह्म्मा जी किसी विशेष यज्ञ का आयोजन कर रहे थे | कोई भी यज्ञ या पूजा बिना पत्नी के पूरा नहीं होता परन्तु उस समय उनकी पत्नी सावित्री वहां मौजूद नहीं थीं और तत्काल  यज्ञ करना बहुत जरूरी था इसलिए उस यज्ञ को संपन्न करने के लिए तब ब्रह्म्मा जी ने गायत्री देवी से विवाह किया और उन्हें अपने साथ यज्ञ में बिठाकर यज्ञ संपन्न किया |

गायत्री मंत्र के लाभ -

गायत्री मंत्र हर प्रकार की समस्या के लिए लाभदायी हैं हम जानते हैं कि हिन्दू सभ्यता में बच्चे को सबसे पहले गायत्री मंत्र  का उच्चारण करना सिखाते हैं | क्योंकि यह जीवन का आधार हैं | चाहे कोई भी समस्या क्यों न  हो हर समस्या का समाधान हैं ये मंत्र | जैसे  कि विद्यार्थी का पढ़ने में मन न लगे ,या फिर शीघ्रता से याद न हो तो १०८ बार गायत्री मंत्र जाप करने से इन समस्याओं से मुक्ति मिल जाती हैं 

* शुक्रवार के दिन पीले वस्त्र धारण  कर हाथी पर सवार  गायत्री माता की  प्रतिमा के समक्ष जाप करने से दरिद्रता का नाश होता हैं |

* यदि किसी के पास संतान न हो या संतान रोगग्रस्त हो तो प्रातः काल पति - पत्नी को एकसाथ  सफ़ेद वस्त्र पहनकर " यौं " बीजमंत्र का सम्पुट लगाके गायत्री मंत्र का जाप करें  | ऐसा करने से संतान संबंधी समस्या से मुक्ति मिलती है |

* शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए मंगलवार ,रविवार औरअमावस्या  के दिन लाल वस्त्र धारण कर माँ दुर्गे का ध्यान करते हुए गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए | जाप करते समय गायत्री मंत्र के आगे - पीछे  " क्लीं " का तीन - तीन बार सम्पुट लगाकर मंत्रोच्चारण करना चाहिए  |

* अगर विवाह में बाधा है तो पीले वस्त्र पहन कर माता पार्वती का ध्यान करते हुए १०८ बार गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए एवं मंत्र के साथ " हीं "  बीजमंत्र का सम्पुट  लगाना चाहिए |