CHANDRAGHANTA DESTROYS ENEMIES

chandraghantaVINAY BAJRANGI

चंद्रघंटा 
तृतीये नव रात्रि  को चंद्रघंटा माता की पूजा की जाती है |
वंदना मंत्र
पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता |
प्रसादं तनुते महयं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।
नव दुर्गा पूजन के तीसरे दिन माँ दुर्गा के तीसरे स्वरुप चंद्रघंटा के शारदागत होकर उपासना, आराधना में तत्पर हो , तो, समस्त सांसारिक कष्टों से विमुक्त हो कर ,  सहज ही परम पद के अधिकारी बन सकते है |
उपर्युक्त मंत्र का जप शुद्ध उच्चारणपूर्वक क्रिस्टल की एक  माला से 108  बार करे | फिर दुर्गा जी की आरती कर के, चंद्रघंटा माता के तांबे का चित्रयुक्त बीसा यंत्र देवी भक्तों में वितरण करें , तो और भी अधिक लाभ प्राप्त होता है |

 

 

दुर्गा माँ की तीसरी शक्ति  का नाम माँ चंद्रघंटा है और इसी कारण से माँ चंद्रघंटा की उपासना तीसरे दिन करने का विधान है | इस दिन साधक का मन मणि पूर्ण चक्र में प्रविष्ट होता है |

इसका अभिप्राय यह हुआ की यदि माँ चंद्रघंटा की कृपा हुई तो साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते है | साथ - साथ दिव्य  सुगंधियों या सुगंध का भी वह अनुभव करता है |

साधक को विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ जैसे की ॐ,  शक्ति स्वरुप सुनाई देती है | और यह क्षण जो है वो साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने वाला होता है | क्योकि उसका मणि पूर्ण चक्र  जागृत अवस्था में आ जाता है |

माँ का चंद्रघंटा स्वरुप बहुत ही शांतिदायक एवं कल्याणकारी  होता है | उनकी ललाट पर घंटे के आकर का अर्धचंद्र है इसी कारण से इन्हे चंद्रघंटा देवी कहा जाता है |

इनके शरीर का जो रंग है वो स्वर्ण के सामान चमकीला होता है | इनकी दस भुजाएं होती है |  इनके दसों हांथो में शस्त्र  या बाण  होता है तथा  इनका वाहन सिंह  है|  इनकी मुद्रा युद्ध के लिए तैयार  रहने वाली  है |

 यदि माँ चंद्रघंटा की कृपा हो जाए , तो समस्त पाप और बँधाये समाप्त हो जाती है, और आराधना फलदाई और सफलतादायक   होती  है |

यह भक्तो के कष्ट का  निवारण शीर्घ करने वाली होती है | और ये भक्त को  पराक्रमी और निर्भय बना देती  है | सबसे बड़ी बात यह है, कि  यदि भक्त को लगता है , कि प्रेत बांधा है, तो माँ चंद्रघंटा की स्तुति व पूजा करना हमेशा लाभकारी रहता है |

माँ चंद्रघंटा का ज्योतिष सम्बन्ध

जैसा की ऊपर  आपको मैंने बताया की ये उपासक या साधक को पराक्रमी या निर्भय बनाती है | इसका अभिप्राय यह हुआ की यह साधक के छठें  भाव को जाग्रित अवस्था में रखती है |

यदि साधक का या उपासक का कोई कोर्ट केसचल रहा हो या फिर उसका किसी से किसी प्रकार का बैर हो तो, माँ जो है साधक की हमेशा रक्षा करती है और विजय दिलाने में हमेशा तात्पर्य रहती है | तो इनकी पूजा करने से आपका छठा भाव जाग्रित रहता है | और साथ - साथ एकादश भाव के अंदर भी बल  आ जाता है |