अहोई अष्टमी कौन,क्यों और कब करे |

अहोई अष्टमी कौन,क्यों और कब करे |

अहोई अष्टमी कौन,क्यों और कब करे |

संतान को लम्बी आयु देने वाला सुख सौभाग्य प्रदान करने वाला ऐसा व्रत जिसे हर माँ कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को करती है | बहुत सी ऐसी स्त्रियां जिनके संतान नहीं होती वो संतान प्राप्ति के लिए भी इस व्रत को करती है | यह त्यौहार करवाचौथ  के 4 दिन बाद और दीपावली के ठीक 7 दिवस पहले मनाया जाता है। शाम के दौरान आकाश में तारों को देखने के बाद व्रत तोड़ा जाता है. (कुछ महिलाएं चंद्रमा के दर्शन करने के बाद व्रत तोड़ती हैं  |

इस वर्ष अहोई अष्टमी का व्रत 12 अक्टूबर को है। पूजन का समय शाम 17.50 से 19.06 तक है। अष्टमी के दिन चंद्रोदय का समय रात 23.53 है।

वैदिक रीतियों के अनुसार कहते है की किसी गांव में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे थे। दीपावली से पहले साहूकार की पत्नी मिट्टी लेने खदान गई। वहां वह कुदाल से मिट्टी खोदने लगी। अचानक कुदाल स्त्री के हाथों से “साही” के बच्चे को लग गई, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। उसके बाद साही ने उसकी कोक बांध दी |कुछ समय बाद साहूकारनी के एक -एक करके सातों बेटों की मौत हो गयी । इससे वह बहुत दुखी रहने लगी। एक दिन उसने अपनी एक पड़ोसी को “साही” के बच्चे की मौत की घटना कह सुनाई और बताया कि यह हत्या उससे गलती से हुई थी जिसके परिणाम स्वरूप उसके सातों बेटों की मौत हो गई। वृद्ध औरत ने कहा आज जो बात तुमने सबको बताई है, इससे तुम्हारा आधा पाप नष्ट हो गया है। इसके साथ ही, उन्होंने साहूकारनी को अष्टमी के दिन भगवती माता तथा “साही” और “साही” के बच्चों का चित्र बनाकर उनकी आराधना करने को कहा। साहूकार की पत्नी उनकी बात मानते हुए कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को व्रत रखा व विधि पूर्वक पूजा कर क्षमा याचना की। इसी प्रकार उसने प्रतिवर्ष नियमित रूप से इस व्रत का पालन किया। जिसके बाद उसे सात पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई। इसी प्रकार महिलाओं को  अहोई अष्टमी के दिन पुरे विधि विधान से पूजा करनी चाहियें

इस दिन महिलाएं दिनभर उपवास रखती हैं शाम को सूर्यास्त के बाद अहोई माता की पूजा प्रारंभ होती है। अनहोनी को होनी बनाने वाली माता देवी पार्वती हैं इसलिए माता पर्वती की पूजा करें। अहोई माता की पूजा के लिए गेरू से दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाएं और साथ ही सेह और उसके सात पुत्रों का चित्र बनाएं। संध्या काल में इन चित्रों की पूजा करें। पूजन से पहले जमीन को स्वच्छ करके, पूजा का चौक पूरकर, एक लोटे में जलकर उसे कलश की भांति चौकी के एक कोने पर रखें और भक्ति भाव से पूजा करें. बाल-बच्चों के कल्याण की कामना करें। साथ ही अहोई अष्टमी के व्रत कथा का श्रद्धा भाव से सुनें।