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जब शनि ने मानी संकट मोचक से हार…

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हनुमान जी अमर हैं। संकटमोचक है लेकिन वो इस सबका श्रेय आप नहीं लेते बल्कि इसका श्रेय भगवान श्रीराम को देते हैं। हनुमान जी मानते थे जब भी मैं श्री राम जी का स्मरण करता हूं तो पाप ग्रहों का अपने आप नाश हो जाता है। हनुमान जी एक कथा में वर्णन करते हुए बताते है कि जब मैं श्री राम जी का ध्यान कर रहा था तो उसी समय ग्रहों में पाप ग्रह, मंद गति सूर्य पुत्र शनि देव आए। शनि देव का हमेशा सिर झुका रहता था। जिस पर वो अपनी एक नज़र डालते वह तबाह हो जाता था लेकिन शनि देव हनुमान जी की शक्ति से अनजान थे। हनुमान जी ने उन्हें लंका में दशग्रीव के बंधन से छुड़वाया था। उन्होंने हनुमान जी को बड़े ही सम्मान भाव से कहा कि मैं आपको सुचेत करने के लिए आया हूं कि त्रेता युग नहीं रहा और यह युग कलियुग का है। इस युग में मैं आपसे ज्यादा ताकतवर और बलवान हूं। आप बहुत कमजोर हैं। उन्होंने कहा कि आप पर मेरी साढ़ेसती का प्रभाव रहेगा। लेकिन शनि देव इस बात से अनजान थे जो भगवान राम के सच्चे भक्त है। उन पर काल बदलने पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता। हनुमान जी के हृदय में तो राम जी पल-पल समाए रहते हैं। फिर भला कैसे काल उनका बाल भी बांका कर सकता है।

हनुमान जी को भगवान श्री राम जी के सच्चे भक्त थे। उन्होंने कहा कि आप कही ओर जाईए मुझ पर आपकी बातों का कोई असर नहीं होगा। ग्रहों का प्रभाव मरने वाले प्राणियों पर ही पड़ता है। मेरे शरीर में रघुराम के सिवाय कोई ओर समा ही नहीं सकता।

शनि देव तो अपनी जिद्द पर अड़े हुए थे। वे बोले मैं सृष्टिकर्ता का जो विधान मैं तो वही करूंगा। आप इस क्षेत्र में आते हैं। पूरे साढ़े बाईस वर्ष व्यतीत होने पर साढ़े सात वर्ष के अंतर से ढाई वर्ष तक मेरा असर हर प्राणी पर पड़ता है। शनि देव ने कहा मेरी साढ़ेसती आप पर भी हावी होकर रहेगी।

शनि कहते है कलियुग के इस युग में देवता या उपदेवता कोई भी नहीं रहेगा। उन्होंने कहा कि सबको अपना आवास सूक्ष्म लोक में रखना होगा।

शनि अपनी जिद्द पर अड़े थे तो हनुमान जी ने भी ठान रखा था कि शनि को अपनी हार स्वीकार करनी ही पड़ेगी। शनिदेव हनुमान जी के मस्तक पर आ बैठे। जैसे ही हनुमान जी के सिर पर खाज हुई तो उन्होंने खाज को मिटाने के लिए बड़ा पत्थर उठा लिया। आखिर में शनि देव हनुमान जी के चरणों में गिर पड़े और कहा कि मैं हमेशा आपके कहे अनुसार चलूंगा। इस तरह शनि देव को हनुमान जी से हार का सामना करना पड़ा।

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