नवरात्र एवम् ज्योतिष

navratr-jyotish

नवरात्रे माँ पार्वती, माँ लक्ष्मी व माँ सरस्वती के नौ स्वरुपो की पूजा तथा दुष्ठों पर विजय का प्रतीत के अतिरिक्त और भी महत्व रखते है। खगोलिय एवम् ज्योतिषीय विचारधारा के अनुसार एक साल मे प्रृथ्वी पर दो महत्वपूर्ण सूर्य प्रभाव पड़ते हैं तथा ॠतुओं का निर्धारण भी उन दो प्रभावों से होता है जिस दिशा मे सूर्य जाता प्रतीत होता है। एक बार जब सूर्य विषुवत्त रेखा के दक्षिण मे जाता है (दक्षिणायन) तब सूर्य बहुत तीक्ष्ण नही होता तथा वायुमंडल मे काफ़ी आद्रता तथा नमी रहती है। दूसरी बार जब सूर्य विषुवत्त रेखा के उत्तर की तरफ़ जाता है (उत्तरायण), यहां सूर्य तीक्ष्ण होता है तथा वायुमंडल मे आद्रता या नमी कम हो जाती है।

पहला शीत ॠतु की शुरुवात बतलाता है तथा दूसरा ग्रीष्म ॠतु की। यह दो ॠतुओं की संधि मानव प्रजाती पर शारीरिक एवम् मानसिक रूप से प्रतीकूल प्रभाव डालती है।

इन अंतराल मे जब ॠतुओं की सन्धि की बेला होती है और जब मानव शारीरिक एवम् मानसिक रूप से दुर्बल हो जाता है, मां दुर्गा के समस्त रूपों की पूजा अर्चना करने का प्रावधान है।

एक ॠतु सन्धि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक होती है जिसे राम नवरात्री भी कहते हैं तथा दूसरी सन्धि अश्विन मास के शुक्ल पक्क्ष की प्रतिपदा से नवमी तक होती है जिसे दुर्गा नवरात्री भी कहते हैं।

ज्योतिष के माध्यम मे ॠतु सन्धि को वर्गिकृत करना तथा आयुर्वेद के माध्यम से उन सम्भावित रोगों का उन्मूलन करना यह नवरात्रों की छुपी अवधारणा है।

नवरात्रो के नौ दिन तीन देवीयों, पार्वती, लक्ष्मी, एवम् सरस्वती के नौ स्वरुपों की पूजा की जाती है, जिसमे पहले दिन पार्वती के तीन स्वरूप ( जो राहु की अधिपति मानी जाती है तथा जिनकी उर्जा से राहु के नकारात्मक प्रभाव जाते रहते हैं ) अगले तीन दिन लक्ष्मी मां के स्वरुपों (जो शुक्र की अधिपति मानी जाती हैं तथा सुख, आनन्द तथा माया की दायक हैं) और आखिरी के दिन सरस्वती माता (जो आकादमिक शिक्षा की दायक है) के तीन स्वरुपों की पूजा की जाती है।

यह पूजायें यदि विधि विधान से सम्पन्न की जायें तो समस्त देवीयों का जातक को आशीर्वाद प्राप्त होता है तथा वह संसार मे व्याप्त नकारात्मक उर्जा से लडने मे समर्थ हो जाता है।

प्रथम दुर्गा – श्री शैलपुत्री – इनकी पूजा करने से मूलाधार चक्र जाग्रत होता है। कुण्डली मे यदि बिमारी के योग होते हैं तो वे भी क्षीण हो जाते हैं।

द्वितीय दुर्गा – श्री ब्रह्मचारिणी – इनकी उपासना से मनुष्य मे तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार की वृद्धी होती है तथा मन कर्तव्य पथ से विचलित नही होता। कुण्डली मे मन कितना भी दुर्बल हो, इनकी पूजा करने से बलवान होता है।

त्रितीय दुर्गा – श्री चन्द्रघन्टा – इनके पूजन से साधक को मणिपुर चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वत: प्राप्त हो जाती हैं तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। कुण्डली यदि उर्जा की कमी दिखलाती है तो इस दिन पूजा करने से वह भी प्राप्त हो जाती है।

चतुर्थ दुर्गा – श्री कृष्मांडा: – इनकी उपासना से अनाहत चक्र जग्रति कि सिद्दियां प्राप्त होती है। कुण्डली मे यदि कोई रोग या शोक व्याप्त है तो इस दिन उपासना करने से यह सब दूर होता है तथा आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है।

पंचम दुर्गा – श्री स्कंद माता – इनकी अराधना से विशुद्ध चक्र से जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वत: प्राप्त हो जाती हैं तथा मृत्यु लोक मे ही साधक, चाहे उसकी कुण्डली मे कितने अवगुण क्यों न हो, परम शान्ति और सुख का अनुभव करने लगता है। उसके लिये मोक्क्ष का द्वार स्वमेव सुलभ हो जाता है।

षष्ठम् दुर्गा – श्री कात्यायनी – श्री कात्यायनी की उपासना से आज्ञा चक्र जगृति कि सिद्धियां साधक को स्वमेव मिल जाती हैं। वह इस लोक मे रह कर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से मुक्त हो जाता है तथा उसके रोग, दोष, संताप, भय आदि सर्वथा के लिये नष्ट हो जाते हैं।

सप्तम दुर्गा – श्री कालरात्री – नवरात्री के सप्तम दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है। श्री कालरात्री की साधना से साधक को भानुचक्र की सिद्धियां स्वमेव मिल जाती हैं। कुण्डली मे विद्यमान किसी प्रकार के अनिष्ठ रोगों से छुटकारा मिल सकता है।

अष्टम दुर्गा – श्री महागौरी – नवरात्री के अष्टम दिन श्री महागौरी की अराधना की जाती है, जिससे सोम चक्र जाग्रति की सिद्धियां प्राप्त होती है। कुण्डली मे विद्यमान असंभव योग भी संभव हो जाते है।

नवम् दुर्गा – श्री सिद्धिदात्री – नवरात्री के नवम दिन श्री सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है जिससे साधक को सभी सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। सृष्टि मे कुछ भी उसके लिये अगम्य नही रह जाता।

यदि विधि विधान का ध्यान रखते हुए उपरोक्त देवियों की स्तुति क्रमश: की जायेगी तो गोचर एवम कुण्डली से उत्पन्न होने वाले भय इत्यदि से जातक मुक्त हो जता है तथा उसमे विद्यमान कुण्डली मे केन्द्रित विभिन्न दोष भी जाते रहेंगे।

 

……………………………………… । ॐ । ……………………………………………

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