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स्वास्तिक है सुख का प्रतीक

swastik

मनुष्य हमेशा सुख के पीछे भागता है और भगवान से भी हमेशा यही कामना करता है कि भगवान उनके परिवार पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें। परिवार में कोई भी छोटा सा संकट आ जाए तो पूरा परिवार घबरा जाता है और घर की स्थिति डांवाडोल हो जाती है। इंसान का दिल इतना कमजोर है कि वो जीवन में आने वाली छोटी-छोटी घटनाओं से घबरा जाता है। लेकिन इंसान को इन मुश्किलों से घबराने की बजाए इनका डटकर मुकाबला करना चाहिए, वही सुख को पा सकता है। लेकिन सुख प्राप्ति करने के लिए हिन्दु धर्म में कई क्रियाएं और प्रक्रियाएं की जाती हैं। आईए मैं विनय बजरंगी आपको बताता हूं कि हिंदु धर्म में स्वास्तिक चिन्ह कैसे हमें सुख प्रदान करता है।

स्वास्तिक को  प्राचीन समय से ही शुभता का प्रतीक माना जाता रहा है। कोई भी शुभ कार्य करने के लिए इसे बनाया जाता रहा है और ये परम्परा आज भी चली आ रही है। स्वास्तिक जो सुअसक शब्द से बना है। सु जिसका अर्थ है बढ़िया और मंगलकारी, अस का मतलब है सत्ता या असितत्व और क का अर्थ है करने वाला। स्वास्तिक चिन्ह अपने आप में कई शुभ कार्य, पुण्य कार्य अपने आप में समेटे हुए है जो सबके लिए कल्याणकारी होता है यानि कि सबका कल्याण करता है।

अगर बात करें स्वास्तिक चिन्ह में बनी हुई रेखाओं की तो ये रेखाएं एक दूसरे को काटती हैं जो फिर आगे मुड़ी होती हैं। इन रेखाओं का अर्थ हैं कि सृष्टि में कुछ भी स्थिर नहीं रहता और बदलता रहता है।

इसकी चार रेखाओं का वर्ण चार दिशाओं से किया गया है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि स्वास्तिक का बीच वाला हिस्सा विष्णु की नाभि है चार भुजाओं को ब्रहमा जी के चार मुख और चार वेदों के रूप में दर्शाया गया है।

स्वास्तिक चिन्ह चार दिशाओं के साथ-साथ चार युगों, चार वर्णों, चार आश्रम के अलावा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करने का भी प्रतीक माना जाता है।

स्वास्तिक हमें दुख से निकाल कर सुख की ओर अर्थात् हमारे मन में भरी नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मकता में बदल देता है। देखा आपने ये चिन्ह कैसे सबका कल्याण करता है।

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