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नक्षत्रों से संबंध रखने वाले योग और मुहुर्त

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ज्योतिष शास्त्र में भी नक्षत्रों के स्वभाव, उनकी प्रवृतियां होती हैं जो वारों तिथियों और ग्रहों के समिश्रिण से बने योगों और उनसे पैदा हुए प्रभावों को मुख्य रूप से प्रधानता दी गई है। आईए मैं विनय बजरंगी आपको नक्षत्रों के गुण और विशेषताओं के बारे में बताता हूं। जिनके संयोग से शुभ मुहूर्त और संयोग बनते हैं।

रविवार के दिन पड़ने वाले उत्तरा-फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपद और रोहिणी नक्षत्र को ध्रुव स्थिर नक्षत्र कहा जाता है।  घर का निर्माण, वास्तु शांति, बाग लगाने जैसे शुभ कार्यों के लिए यह योग बहुत शुभ होता है।

मूल, ज्येष्ठा, रेवती, मघा, अश्विनी और अश्लेषा को मूल संज्ञक नक्षत्र के रूप में स्वीकार किया गया है। अत: इन नक्षत्रों में अगर किसी बच्चे का जन्म हो तो यौगिकीय और धार्मिक क्रिया के विधिवत् विधानों से अवश्य शांति करवानी चाहिए।

मेष राशि के लिए मघा, मिथुन के लिए स्वाति, कर्क के लिए अनुराधा, सिंह के लिए मूल, कन्या के लिए श्रवण, तुला के लिए शतभिषा, वृश्चिक के लिए रेवती, धनु के लिए भरणी, मकर के लिए रोहिणी, कुंभ के लिए आर्दा तथा मीन के लिए अश्लेषा नक्षत्र घात नक्षत्र होते हैं। इसलिए इन राशियों के जातक को किसी भी शुभ कार्य को प्रारंभ करते समय इन नक्षत्रों के प्रति विशेष ध्यान रखना चाहिए।

गुरुवार के दिन अगर पुष्य नक्षत्र हो तो इस दिन पुष्य योग घटित होता है। व्यापार प्रारंभ, यात्रा, गृह प्रवेश  जैसे कार्यों के लिए ये योग बहुत ही शुभ माना जाता है।

रविवार वाले दिन अगर पुष्य नक्षत्र हो तो इस संयोग से रवि पुष्य योग उत्पन्न होता है। यौगिक क्रियाओं और मंत्र आदि से साधना के लिए इस योग को अत्यंत लाभदायक माना गया है।

सूर्य विशाखा नक्षत्र में व चंद्र कृत्तिका नक्षत्र में हो तो इस संयोग से अति दुर्लभ समझे जाने वाले पुष्यकर योग की सृष्टि होती है। यह महत्वपूर्ण योग शुभ कार्यों के लिए बहुत ही सिद्धि दायक होता है।

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