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गायत्री मंत्र का महत्व

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गायत्री मंत्र क्या है और ये हमारी किस तरह से सुरक्षा करता है। आईए मैं विनय बजरंगी आपको बताता हूं गायत्री मंत्र के बारे में। सबसे पहले तो मैं आपको बताता हूं कि मंत्र का क्या अभिप्राय है। मनन करने से जो त्राण करता है यानि कि रक्षा करता है उसे मंत्र कहा जाता है। ये मंत्र शब्दात्मक होते हैं। मंत्र शुद्ध, सात्विक, पवित्र और आलौकिक होते हैं। अंतकरण के पर्दे को हटा कर बुद्धि और मन को निर्मल और शुद्ध करते हैं। मंत्रों से शक्ति का संचार होता है और ऊर्जा पैदा होती है।

आईए पहले हम गायत्री मंत्र के एक-एक शब्द का अर्थ बताएंगे। ओम भूर्भव स्व: तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात

गायत्री मंत्र हिंदु धर्म का एक महत्वपूर्ण मंत्र है, जिसका महत्व ओम के समान माना जाता है। इस मंत्र में सावित्र देव की उपासना है। इसलिए इसे सावित्री मंत्र भी कहा जाता है। ऐसा विश्वास किया जाता है इसको जपने और समझने से ईश्वर की प्राप्ति की जा सकती है।

चलिए अब आपको गायत्री मंत्र के शब्दों के अर्थ के बारे में बताते हैं-

ओम-सर्वरक्षक परमात्मा

भू:- प्राणों से भी प्यारा

भुव:- दुख विनाशक

तत्- उस

सवितु:- प्रकाशक, प्रेरक, उत्पादक

वरेण्य- वरने योग्य

भुर्ग:- शुद्ध विज्ञान स्वरूप का

देवस्य- देव के

धीमहि- हम ध्यान करें

धियो- बुद्धियों को

य:- जो

न:- हमारी

प्रचोदयात- शुभ कार्यों में प्रेरित करें।

भाव यह है कि वो प्राणों के सर्वरक्षक प्यारे, दुख दूर करने वाले, सुखस्वरूप श्रेष्ठ, तेजस्वी, पाप हरने वाले, देवों के देव को हम अपनी अंतरआत्मा में धारण करें। परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।

मंत्र का सीधा संबंध ध्वनि से है। इसलिए तो विज्ञान इसे ध्वनि विज्ञान कहता है। मंत्रों में अमूक अक्षरों में का एक विशिष्ट क्रमबद्ध, लयबद्ध और वृत्तात्मक क्रम होता है। मंत्र को एक प्रकार की शक्ति कह लिया जाए तो कहना जरा भी गलत नहीं होगा। हर मंत्र का कोई न कोई अधिष्ठाता-देव या शक्ति होती है। मंत्र में शक्ति उसी अधि शक्ति से आती है। मंत्र की सिद्धि होने पर साधक को उसी देवता की अधि शक्ति अनुदान में मिलती है। जो साधक के तन, मन और शरीर को एक आत्मिक सुकून देती है।

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