Connect
To Top

गयाजी में नौवां विशाल पितृदोष निवारण शिविर

Pitradosh

बजरंगी धाम के तत्वाधान से  आयोजित गयाजी में नौवां विशाल पितृदोष निवारण शिविर |

यहाँ अपने अतृप्त पितरों को मनाएं और कुंडली में उपस्थित पित्र दोष का सम्पूर्ण उन्मूलन करें बिना गयाजी जाए हुए |

जी , यह सिर्फ बजरंगी धाम के द्वारा ही सम्भव है , पंडित विनय बजरंगी के पर्यवेक्षण में होने जा रहा है नौवां विशाल पितृदोष निवारण शिविर जहाँ संकल्प के द्वारा विद्वानों के द्वारा आपके पितृदोष का उन्मूलन किया जाएगा |

इस मौके तो हाथ से न जाने दें और यथा शीघ्र अपना नामांकन करवाएं |

 

गयाजी का महत्व :

वैदिक  मान्यताओं और वैदिक परम्परा के अनुसार पुत्र का पुत्रत्व तभी सार्थक होता है, जब वह अपने जीवित माता-पिता की सेवा करें और उनके मरणोपरांत उनकी बरसी पर तथा पितृपक्ष में उनका विधिवत श्राद्ध करें। विद्वानों के मुताबिक किसी वस्तु के गोलाकर रूप को पिंड कहा जाता है। प्रतीकात्मक रूप में शरीर को भी पिंड कहा जाता है। पिंडदान के समय मृतक की आत्मा को अर्पित करने के लिए जौ या चावल के आटे को गूंथकर बनाई गई गोलाकृत्ति को पिंड कहते हैं।

श्राद्ध की मुख्य विधि में मुख्य रूप से तीन कार्य होते हैं, पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोज। दक्षिणाविमुख होकर आचमन कर अपने जनेऊ को दाएं कंधे पर रखकर चावल, गाय का दूध, घी, शक्कर एवं शहद को मिलाकर बने पिंडों को श्रद्धा भाव के साथ अपने पितरों को अर्पित करना पिंडदान कहलाता है।

जल में काले तिल, जौ, कुशा एवं सफेद फूल मिलाकर उससे विधिपूर्वक तर्पण किया जाता है। मान्यता है कि इससे पितृ तृप्त होते हैं। इसके बाद ब्राह्मण भोज कराया जाता है। पंडों के मुताबिक शास्त्रों में पितृ का स्थान बहुत ऊंचा बताया गया है। उन्हें चंद्रमा से भी दूर और देवताओं से भी ऊंचे स्थान पर रहने वाला बताया गया है।

पितृ की श्रेणी में मृत पूर्वजों, माता, पिता, दादा, दादी, नाना, नानीसहित सभी पूर्वज शामिल होते हैं। व्यापक दृष्टि से मृत गुरू और आचार्य भी पितृ की श्रेणी में आते हैं।

कहा जाता है कि गया में पहले विभिन्न नामों के 360 वेदियां थीं जहां पिंडदान किया जाता था। इनमें से अब 48 ही बची है। वैसे कई धार्मिक संस्थाएं उन पुरानी वेदियों की खोज की मांग कर रही है। वर्तमान समय में इन्हीं वेदियों पर लोग पितरों का तर्पण और पिंडदान करते हैं।

यहां की वेदियों में विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी के किनारे और अक्षयवट पर पिंडदान करना जरूरी माना जाता है। इसके अतिरिक्त वैतरणी, प्रेतशिला, सीताकुंड, नागकुंड, पांडुशिला, रामशिला, मंगलागौरी, कागबलि आदि भी पिंडदान के लिए प्रमुख है। यही कारण है कि देश में श्राद्घ के लिए 55 स्थानों को महत्वपूर्ण माना गया है जिसमें बिहार के गया का स्थान सर्वोपरि है।

भगवान विष्णु मुक्ति देने के लिए ‘गदाधर’ के रूप में गया में स्थित हैं। गयासुर के विशुद्ध देह में ब्रह्मा, जनार्दन, शिव तथा प्रपितामह स्थित हैं। विष्णु ने वहाँ की मर्यादा स्थापित करते हुए कहा कि इसकी देह पुण्यक्षेत्र के रूप में होगी।

यहाँ जो भक्ति, यज्ञ, श्राद्ध, पिण्डदान अथवा स्नानादि करेगा, वह स्वर्ग तथा ब्रह्मलोक में जाएगा, नरकगामी नहीं होगा। पितामह ब्रह्मा ने गया तीर्थ को श्रेष्ठ जानकर वहाँ यज्ञ किया और ऋत्विक रूप में आए हुए ब्राह्मणों की पूजा की।

ब्राह्मणों द्वारा प्रार्थना करने पर प्रभु ब्रह्मा ने अनुग्रह किया और कहा- गया में जिन पुण्यशाली लोगों का श्राद्ध होगा, वे बह्मलोक को प्राप्त करेंगे। जो मनुष्य यहाँ आकर आप सभी का पूजन करेंगे, उनके द्वारा मैं भी अपने को पूजित स्वीकार करुँगा।

यहाँ जो भक्ति, यज्ञ, श्राद्ध, पिण्डदान अथवा स्नानादि करेगा, वह स्वर्ग तथा ब्रह्मलोक में जाएगा, नरकगामी नहीं होगा। पितामह ब्रह्मा ने गया तीर्थ को श्रेष्ठ जानकर वहाँ यज्ञ किया और ऋत्विक रूप में आए हुए ब्राह्मणों की पूजा की।

‘ब्रह्मज्ञान, गयाश्राद्ध, गोशाला में मृत्यु तथा कुरुक्षेत्र में निवास- ये चारों मुक्ति के साधन हैं-‘ गया में श्राद्ध करने से ब्रह्महत्या, सुरापान, स्वर्ण की चोरी, गुरुपत्नीगमन और उक्त संसर्ग-जनित सभी महापातक नष्ट हो जाते हैं।

जिनकी संस्काररहित दशा में मृत्यु हो जाती है अथवा जो मनुष्य पशु तथा चोर द्वारा मारे जाते हैं या जिनकी मृत्यु सर्प के काटने से होती है, वे सभी गया श्राद्ध कर्म के पुण्य से बन्धन मुक्त होकर स्वर्ग चले जाते हैं।

‘गया तीर्थ में पितरों के लिए पिण्डदान करने से मनुष्य को जो फल प्राप्त होता है, सौ करोड़ वर्षों में भी उसका वर्णन मेरे द्वारा नहीं किया जा सकता।’

यहाँ पर पिण्डदान करने से पितरों को परमगति प्राप्त होती है। गयागमन मात्र से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त हो जाता है।

गया क्षेत्र में भगवान विष्णु पितृदेवता के रूप में विराजमान रहते हैं। पुण्डरीकाक्ष उन भगवान जनार्दन का दर्शन करने पर मनुष्य अपने तीनों ऋणों से मुक्त हो जाता है। भगवान जनार्दन के हाथ में अपने लिए पिण्डदान समर्पित करके यह मन्त्र पढ़ना चाहिए-

एष पिण्डो मया दत्तस्तव हस्ते जनार्दन।

परलोकं गते मोक्षमक्षरूयमुपतिष्ठताम्‌॥

हे जनार्दन! भगवान्‌ विष्णु! मैंने आपके हाथ में यह पिण्ड प्रदान किया है। अतः परलोक में पहुंचने पर मुझे मोक्ष प्राप्त हो। ऐसा करने से मनुष्य पितृगणो के साथ स्वयं भी ब्रह्मलोक प्राप्त करता है।

अपने पुत्र अथवा पिण्डदान देने के अधिकारी अन्य किसी वंशज के द्वारा जब कभी इस गया क्षेत्र में स्थित गयाकूप नामक पवित्र तीर्थ में जिसके भी नाम से पिण्डदान दिया जाता है, उसे शाश्वत ब्रह्मगति प्राप्त करा देता है।

बुद्धिमान मनुष्य को इस गया क्षेत्र में अपने लिए भी तिलरहित पिण्डदान करना चाहिए और अन्य व्यक्तियों के लिए भी पिण्डदान करना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

More in News & Events