ज्ञान की देवी : सरस्वती

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ज्ञान की देवी सरस्वती ,जो प्राणियों के हृदय को सरस जल की तरह पवित्र और स्वच्छ बनती है सरस्वती ही वेद (ज्ञान) की उत्पत्ति का कारण है अतः ज्ञानी जनो की आराध्या है और उनके कारण ही समस्त लोको का आविर्भाव हुआ है

सरस्वती का श्वेत वर्ण मोक्ष और सात्त्विकता का प्रतीक है  व  अलंकारिक रहस्य के कारण भगवती  सरस्वती के एक हाथ में वीणा और दूसरे हाथ में पुस्तक होती है  वीणा धारण करने का अभिप्राय है की केवल पुस्तको का ज्ञान पर्याप्त नहीं है बल्कि कला क्षेत्र में भी ज्ञान आवश्यक होता है तथा उसकी भावना से जीवन में मधुरता आती है  पुस्तक का अर्थ है की महापुरुषों ने अपने दीर्घकालीन परख के अनुभवों का संकलन और निचोड़ पुस्तको के रूप को दे रखा है अतः सरस्वती का मोहक रूप न केवल ज्ञान के लिए भी मनुष्य को प्रेरित करती है

सरस्वती का वाहन है मोर जो विद्या व कला संस्कृति का प्रतीक है वह सूक्ष्म शक्ति से संपन्न है मोर को ज्ञान विवेक और परोपकार का प्रतिनिधि मन गया है सरस्वती का वाहन हंस को भी मन गया है जिसका अर्थ है अंधकार से प्रकाश में आना

   विद्या प्राप्ति  हेतु पूजन

प्रातः काल में स्नानादि से निवृत्त हो कर साफ वस्त्र पहन कर शांत मन से सूर्य के समुख साधना में बैठे तथा अपने भीगे मस्तक पर सूर्य की प्रथम किरणों को पड़ने दे  दीर्घ स्वर में ३ बार ॐ का उच्चारण करे तद्पश्चात गायत्री मंत्र का जाप करे

ॐ भू भुर्वः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनःप्रचोदयात

बिना होठ हिलाये(गुरुप्रदत्त ) मंत्र का जाप करे नित्य प्रतिदिन कम से कम एक माला (१०८) का जप होना चाहिए  उसके पश्चात बारह बार गायत्री मंत्र उच्चारण करते रहे सूर्य के सामने हथेलियों को फैलाकर दोनों हाथो को आपस में रगड़ कर नेत्र मस्तक मुख और गले में फेरे  इस साधना से बुद्धि प्रखर और उन्नत हो जाती है

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Author: Dr. Vinay Bajrangi

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